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पत्रकारों के बहाने चाँदी कौन पीट रहा है..!

समीर खान, नरसिंहपुर। त्यौहार आते हैं तो खुशियाँ लाते हैं, इन खुशियों में इजाफा करने सिस्टम महकमे के साथ पत्रकारों को भी खुशियों के लिफाफे बांटता है। यह सब इसलिए होता है कि राष्ट्रीय पर्वों पर विभाग हर पत्रकार को विज्ञापन रूपी सहयोग नहीं दे पाते तो त्यौहार के बहाने उसे साल में एक दो मर्तबा उपकृत कर देते हैं। लोकतंत्र का सबसे कमजोर व्यक्ति, अर्थात पत्रकार बड़ा निरीह है, हालांकि यह जितना भी दम भर ले हल्के रंग के हरे नोट में ही संतुष्ट हो जाता है, यह उम्मीद हल्के गुलाबी रंग की रखता है पर किसी को एक दो या चार हरे नोट में ही समझौता करना पड़ता है। बीते सालों की तरह इस बार फिर कार्यालयों के बाहर पत्रकारों के फटाखा फोड़ने की धमक देखी गई, समस्या यह अधिक आ रही है कि दीपावली की व्यवस्था करने वाला विभागीय व्यवस्थापक अपने विभाग के सुविधा सम्पन्न अधिकारी कर्मचारियों से पत्रकारों को उपकृत करने मिठाई व बड़े फटाखों के नाम चन्दा करता है और पत्रकारों को फुलझड़ी पकड़ाता है, जिससे पत्रकारों में आक्रोश जन्म लेता है। कुछ विभागों में तो चन्दा फटाखों के नाम पर किये गए चंदे को वितरित करते समय टिकली पकड़ा दी जाती है, जिससे पत्रकारों का दिमाग पटखना बम बन जाता है। इस कार्य के लिए विभागों में बहुत कुशल व्यवस्थापक नियुक्त किये गए हैं जो सबके कद का आंकलन कर उसकी हैसियत के मुताबिक रस्सी बम, सुतली बम, राकेट, अनारदाना, चकरी, फुलझड़ी आदि वितरित करता है। असल में पत्रकारों का पटखना बम यही से फूटना शुरू हो जाता है, कुछ पत्रकार तो बरईया बनकर झूम जाते हैं, तब इस अप्रत्याशित कार्रवाई से व्यवस्थापक नदारत हो जाता है। इस व्यवस्था बनाने की सारी निजी कवायद में एक और बड़ा खेल है, विभाग का मंजा हुआ व्यवस्थापक अपने साहब को पत्रकारों की व्यवस्था हेतु एक अनुमानित राशि बताता है, साहब अपने मातहतों को समान रूपसे चन्दा करने का हुक्म देते हैं, फिर जब एक मुश्त रकम हाथ आ जाती है तो व्यवस्थापक सबको यथायोग्य सहयोग प्रदान करता है। बात यहीं खत्म नहीं हेतु जब सहयोग हो जाता है तब व्यवस्थापक एक सूची तैयार करता है, जिसमें सबके नाम के आगे सम्मान मिठाई व पटाखे देने की बात लिख दी जाती है पर मिठाई व पटाखे दो चार लोगों को ही मिल पाते हैं, शेष को फुलझड़ी अनारदाने में ही सब्र करना होता है। व्यवस्थापक की बनाई सूची देखकर साहब खुश हो जाते हैं, अगर किसी ने साहब से शिकायत कर भी दी तो व्यवस्थापक पहले ही बता देता है साहब दो सैंकड़ा तो लोग हैं, चन्दा कम हुआ तो सबको बराबरी से दे दिया। साहब अपने व्यवस्थापक को शाबाशी देते हैं कि वेरी गुड..! लेकिन जिन्हें साँप टिकिया, टिकली और फुस्सी बम मिलते हैं उनका दर्द पटखना बम बनकर बाहर आ जाता है। इस तरह पत्रकारों का दीवाली पर दिवाला हो जाता है और चाँदी व्यवस्थापक पीट जाता है। आखिर चन्दे की राशि में हक़ तो उसका भी बनता है, फिलहाल तो आज से व्यवस्थापक कार्यालय से गायब हो गए हैं जिन्हें सरगर्मी से तलाश किया जा रहा है।