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गोवर्धन पूजा के पावन पर्व पर भगवान श्री कृष्ण आपको एवं आपके परिवार को सुख, समृद्धि प्रदान करें

कंस वध के बाद उज्जैन पढऩे आए थे भगवान श्रीकृष्ण, 64 दिन में सीखी थीं 64 विद्या और 16 कलाएं 

हेमन्त व्यास, उज्जैन। भगवान श्रीकृष्ण के गुरु महर्षि सांदीपनिजी का यह आश्रम करीब 5 हजार 273 वर्ष प्राचीन है। इस आश्रम में गुरु सांदीपनि की प्रतिमा के समक्ष चरण पादुकाओं के दर्शन होते हैं। 

महर्षि सांदीपनि व्यास जी बहुत ही कोमल ह्रदय वाले एक नेक विद्वान् थे।

पांच पांडवों को साथ लेकर महाभारत के युद्ध में कोरवों को परास्त कर विजयश्री प्राप्त करने वाले भगवान श्रीकृष्ण को जगत गुरु की उपाधि उज्जैन में ही मिली थी। बात, 5 हजार वर्ष पुरानी है, जब भगवान श्रीकृष्ण, उनके सखा सुदामा और भाई बलराम ने सांदीपनि आश्रम में शिक्षा ग्रहण की थी, यही नहीं, उनके गुरु महर्षि सांदिपनी श्रीकृष्ण की लगन और मेहनत से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें जगत गुरु की उपाधि दी। तभी से श्रीकृष्ण पहले जगत गुरु माने गए।

 महर्षि सांदीपनि व्यास ऋषि के वंशज,,, मेरे छोटे भाई मुख्य पुजारी रूपम व्यास ने बताया कि अवंतिका (उज्जैन) का महर्षि सांदिपनी आश्रम है जहां भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा ने शिक्षा ग्रहण की।

इस आश्रम में *गुरु महर्षि सांदीपनि व्यासजी* की प्रतिमा के समक्ष चरण पादुकाओं के दर्शन होते हैं। यहीं रहकर भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा ने शिक्षा प्राप्त की थी। उल्लेख मिलता है कि मात्र 11 साल 7 दिन की उम्र में कृष्ण अपने मामा कंस का वध करने के बाद बाबा महाकालेश्वर की नगरी अवंतिका पधारे और 64 दिनों तक रहे थे। इन 64 दिनों में उन्होंने 64 विद्या और 16 कलाओं का ज्ञान प्राप्त किया था। 

भगवान के हाथ में दिखाई देती है स्लेट व कलम 

यहां भगवान श्रीकृष्ण की बैठी हुई प्रतिमा के दर्शन हमें होते हैं, जबकि बाकी अन्य मंदिरों में भगवान खड़े होकर बांसुरी बजाते नजर आते हैं। भगवान कृष्ण बाल रूप में हैं, उनके हाथों में स्लेट व कलम दिखाई देती है, जिससे यह प्रतीत होता है, कि वे विद्याध्ययन कर रहे हैं। 

यहां हुआ हरि से हर का मिलन 

हरि अर्थात कृष्ण और हर यानी भोलेनाथ। भगवान श्रीकृष्ण जब सांदीपनि आश्रम में विद्याध्ययन करने पधारे, तो भगवान शिव उनसे मिलने, उनकी बाल लीलाओं के दर्शन करने महर्षि के आश्रम आए, यही वह दुर्लभ क्षण था, जिसे हरिहर मिलन का रूप दिया गया। जोकि वैकुंठ चतुर्दशी पर हुआ था।

यहां है खड़े नंदी की प्रतिमा 

महर्षि सांदीपनि के आश्रम में ही भगवान शिव का एक मंदिर भी है, जिसे कुंडेश्वर महादेव कहा जाता है। जब भगवान शिव अपने प्रभु श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का दर्शन करने यहां पधारे, तो गुरु और गोविंद के सम्मान में नंदीजी खड़े हो गए। यही वजह है कि यहां नंदीजी की खड़ी प्रतिमा के दर्शन भक्तों को होते हैं। देश के अन्य शिव मंदिरों में नंदी की बैठी प्रतिमाएं ही नजर आती हैं।

प्राचीन सर्वेश्वर महादेव के भी होते हैं दर्शन 

गुरु महर्षि सांदीपनि व्यास ने अपने तपोबल द्वारा बिल्वपत्र के माध्यम से एक शिवलिंग प्रकट किया था, जिसे सर्वेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। गोमती कुंड के समीप ही इस मंदिर में भगवान शिव की दुर्लभ प्रतिमा स्थापित है। यहां पढऩे वाले बच्चों को पाटी लिखकर दी जाती है, ताकि उनका पढ़ाई में मन लगा रहे और बड़े होकर जब वे किसी साक्षात्कार के लिए जाएं तो यह पाटी अपने साथ रखें, अवश्य सफलता मिलती है। इसलिए नाम पड़ा अंकपात 

भगवान कृष्ण जब पट्टी (स्लेट) पर जो अंक लिखते थे, उन्हें मिटाने के लिए वे जिस गोमती कुंड में जाते थे, वह कुंड यहां आज भी स्थापित है। अंकों का पतन अर्थात अंक धोने के कारण है कि इस आश्रम के सम्पूर्ण क्षेत्र को अंकपात के नाम से जाना जाता है।

यह परंपरा गुरु महर्षि सांदीपनि व्यास आश्रम में आज भी चल रही है। *मेरे छोटे भाई मुख्य पुजारी रूपम व्यास के अनुसार शहर के नागरिक ही नहीं देशभर से लोग अपने बच्चे को पहली बार स्कूल भेजने के पहले यहां आकर उनका विद्यारंभ संस्कार कराते हैं। गुरु पूर्णिमा पर भी यहां विद्यारंभ संस्कार के लिए दो सौ से ज्यादा लोग आते हैं। सालभर यहां आने वाले यात्रियों को भी जब इसकी जानकारी मिलती है तो वे बच्चों का विद्या-बुद्धि संस्कार कराने को उत्सुक हो जाते हैं।

मेरे भाई मुख्य पुजारी  रूपम व्यास ने बताया कि भगवान कृष्ण, सुदामा और उनके भाई बलराम ने सांदिपनी आश्रम में शिक्षा ली थी। गुरु महर्षि सांदीपनि व्यास ने भगवान कृष्ण को जगत गुरु की उपाधि दी थी। यह बात लगभग 5 हजार वर्ष पुरानी है। इसके प्रमाण आज भी आश्रम में मौजूद हैं।